Saturday, June 1, 2019

Eid mubarak...

आज  मुझे मेरा घर याद आया...
वही मकान और वही कमरा याद आया  ...
और उस कमरों मैं देखा सारा सपना  याद आया....
आज  मुझे मेरा घर याद आया...
कुछ खट्टी मीठी यादो का बसेरा याद आया...
वही गलियों का शोर शराबा याद आया...
आज  मुझे मेरा घर याद आया...
ईद मैं सजा हुआ वो रास्ता याद आया...
माँ के हाथ का वो सेवइयां याद आया...
इत्र सुरमा और कुर्ता याद आया...
आज  मुझे मेरा घर याद आया...
ईद के दिन वो नाहा के तैयार होना याद आया...
नमाज़ पढ़ने के बाद ईदी माँगना याद आया...
आज  मुझे मेरा घर  याद आया...
और घर मैं बीता वो बचपन याद आया...


Tuesday, April 30, 2019

Aaj thoda dil mayush mera bhi hai...


aaj thoda dil mayush mera bhi hai...
aaj yaad jo uski aa rahi hai...
shayad kuch chizeen maine khoya...
isiliye tanhai aaj mujhe sata rahi hai..

maana k kuch sapne poore ho rahe hain...
lekin kuch tutne bhi wale hain...
mere dil k kareeb jo bahat tha...
wo shayad ab dur jaa raha hai..
maana k kuch sapne poore hue..
lekin bahat kuch tutne wale hain..

Ye aisa waqt hai jo bayan nahi kar sakte tum...
sab kuch jante hue bhi usko nahi bhula sakte tum...
saare armaan jo baas ek insaan se jude hue the..
aaj usko bikharne se bhi nahi rok sakte tum..




Monday, January 28, 2019

Sab kehte hain...

सब केहते हैं मैं हूँ अपनी माँ जैसा...
सच्च केहते हैं... क्यों के माँ ने मुझे गोध मैं खिलाया...
पर चलना मुझे मेरे बाबा नैं सिखाया...

सब केहते हैं मैं हूँ अपनी माँ जैसा...
सच्च केहते हैं...क्यों के माँ ने मुझे अपनी आँगन में खिलाया...
पर उसी आँगन मैं मेरे बाबा ने मुझे घोडा बन के घुमाया...

सब केहते हैं मैं हूँ अपनी माँ जैसा...
सच्च केहते हैं...क्यों के माँ ने मुझे हसना सिखाया...
पर दूसरों को हसाना मेरे बाबा ने सिखाया...

सब केहते हैं मैं हूँ अपनी माँ जैसा...
सच्च केहते हैं...क्यों के माँ ने ही मेरे बुखार मैं जग के मुझे पानी की पट्टी चढ़ाई...
पर रात भर मेरा हाथ पकड़ कर मेरे बाबा ने ही मुझे लोरी सुनाई...

सब केहते हैं मैं हूँ अपनी माँ जैसा...
सच्च केहते हैं...क्यों के मेरे गिरने पर सबसे ज़ादा मेरी माँ ने ही आंसू बहाया...
पर गिर कर खड़े होना मेरे बाबा ने ही सिखाया...

सब केहते हैं मैं हूँ अपनी माँ जैसा...
सच्च केहते हैं...क्यों के माँ ने ही मेरे कामयाबी के लिए हमेशा अल्लाह को बुलाया...
पर मेरे सपनो की कीमत को मेरे बाबा ने चुकाया... 

Friday, January 18, 2019

Kabhi kabhi yuhi

दिन वो भी थे जब हर छोटी छोटी चीज़ों  के लिए वो माँ को बुलाते थे...
खाना नहीं अच्छा बना ये कहकर कितने नखरे दिखाते थे...
आकर देखिये वो अब कुछ भी खा लेते हैं...
क्यों की बेटे भी घर छोड़ जाते हैं...

दादी नानी के किस्से सुनके जो बड़े हुए...
आज भी वो किस्से उनको याद आते हैं...
क्या दिन थे वो ये सोचकर दो आंसू वो भी बहा लेते हैं...
क्यों की बेटे भी घर छोड़ जाते हैं...

ईद मैं सजी हुई वो मोहल्ले की गलियां...
जिनकी लाइटों की रौनक आज भी उनके दिल मैं चमक्ती हैं...
मिस्स हो गयी इस्स साल की भी ईद मेरी अपनों के साथ...
ये सोचकर वो भी मायुश हो जाते हैं...
क्यों के बेटे भी घर छोड़ जाते हैं...

हर रोज़ तो बात हो ही जाती है माँ बाबूजी से...
लेकिन फिर भी क्यों कुछ बातें बोलनी रेह ही जाती हैं...
बहत मिस्स करता हूँ आपको ये क्यों कभी नहीं बोल पाते हैं...
क्यों के बेटे भी घर छोड़ जाते हैं...

Tuesday, January 15, 2019

Zindegi kuch aur hoti


अक्सर बहत सी चीज़ें अधूरी ही रह जाती हैं.. 
पास आके भी क्यों आखिर बिछड़ ही जाती हैं... 
किस्मत है या दस्तूर ज़िन्दगी का... 
लेकिन क्यों चाहा के भी कुछ चीज़ें वापस नहीं आती हैं... 

ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ... 
बहत कुछ अधूरा मेरा भी रह गया... 
जो दिल के मेरे भी बहत करीब था... 
पता नहीं कैसे पर खो ही गया... 

ढूंढ़ने की कोशिश करता हु आज भी मैं... 
सोचता हु के शायद रोक सकता था उसको... 
बोलना चाहता था जो दिल मैं था मेरे हमेशा से... 
पर बोल ना पाया कभी भी उसको... 

सपने मैंने भी देखे थे बहत सारे... 
लेकिन वो अधूरे ही रेह गये हैं... 
उसके साथ ही रहना था मुझको
पर अब अकेले ही रेह गए हैं... 

ज़िन्दगी की कश्मकश मैं जब मैं जूझ रहा था... 
अकेले लड़ता रहा ये सोचकर के एक दिन हम साथ होंगे.... 
लेकिन वक़्त कुछ ऐसा था के हम समझ ना पाए एक दूसरे को... 
और जब वक़्त मेरे पास था तब वो छोड़ जा चुकी थी मुझको... 

खुस हु मैं उसके लिए क्यों की वो खुस है... 
टूट ही गया दिल मेरा पर चाहता हु वो सलामत रहे... 
लेकिन फिर भी कभी कभी लगता है... 
शायद ज़िन्दगी कुछ और होती
अगर हम एक दूसरे के साथ होते... 


Tuesday, January 1, 2019

Naya saal Mubarak

दिन को महीने और महीनो को साल होते देखा
मैंने भी इस साल कुछ चीज़ों को बदलते देखा
कुछ पाने के आस मैं शायद कुछ खोया मैंने
इस साल मैंने भी अपने माँ बाप को बुड्ढे होते देखा

माना के व्हाट्सप्प और फेसबुक से दूरियां काम हो जाती है
लेकिन अब भी क्यों मुझे मेरे सेहर की वो गालियां रोज़ बुलाती हैं

शायद कुछ और साल ऐसे ही बिताऊंगा
अपनों से दूर रहकर शायद कुछ और पैसे कमाऊंगा
फिर अगले साल खुदको एहि कहकर मनाऊंगा
के एक दिन में घर वापस लौट आऊंगा। 

Friday, January 20, 2012

ETERNITY...CHAPTER 1


Often I have noticed people getting satisfied with the little success they get as touchwood. I’m not here to judge anybody for their strive for success or the number of failures they have come across during their reign of mortality.
Neither am I stating any point. This story or u might say it as a dissatisfied state of mind being expressed in words.
Why does every achievement fades so quickly when u are a grown up compared to that in child hood when even a small thing seemed so eye catching and all that mattered was to get that thing until someone else gets it.
But back then also days were tough, it always was. But still the dependency was always there. There was always someone when it came to guidance. My father took two steps forward to hold me when I was about to fall and my mother stayed behind me to ensure that I don’t fall back.
They made me walk when all I did was crawl and reach the top most steps and try to come back but were unable to do it as I got nervous with the height while descending.